Monday, October 13, 2014


गयी याद शाम ढलते ही 
बुझ गया दिल चिराग जलते ही 
 
खुल गये शहर--गम के दरवाज़े 
एक ज़रा सी हवा के चलते ही 
कौन था तू के फिर ना देखा तुझे
मिट गया ख्वाब आँख मलते ही

तू भी जैसे बदल सा जाता है
अक्स-ए-दीवार के बदलते ही

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