इलाही क्या मोहब्बत का सिला है
मैं उसको वो किसी को सोचता है
कभी बसता था जो दिल में हमारे,
परायी आँख का काजल बना है,
कोई उम्मीद तुम उससे ना रखना,
हमें मालूम है वो बेवफा है,
शिकन लफ़्ज़ों पे मेरे आ गयी क्यूँ,
वो चुप रह के भी क्या क्या बोलता है
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