Monday, November 28, 2011


बहुत मुद्दत से ऐसा है,
के तुम ख़ामोश रहते हो,
कोई गहरा है ग़म शायद,
जिसे चुप चाप सहते हो,
यूँही चलते हुए तन्हा,
कोई ग़मगीन से नगमें,
तुम अक्सर गुनगुनाते हो,
दोरान-ऐ-गुफ्तगू यूँही,
मिलें नज़रों से जब नज़रें,
तो बातें भूल जाते हो,
किसी गुम सुम सी हालत में,
या फिर बारिश के मौसम में,
फ़क़त इतना ही कहते हो,
उदासी बेवजा सी है,
बहुत बोझल तबियत है.
...
भला सच क्यूँ नहीं कहते,
मुझे तुम याद करते हो…!


Saturday, November 19, 2011



न करते शोर शराबा तो और क्या करते,
तुम्हारे शहर में कुछ और काम काज भी हो

रहेगी कब तलक वादों में कैद खुशहाली,
हर एक बार ही कल क्यूं?? कभी तो आज भी हो

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
अगर न हो कही ऐसा तो एहतजाज भी हो


- निदा फाजली

Friday, November 18, 2011


ये  शीशों  के  सपने ,
ये  धागों  के  रिश्ते ,
किसे  है  खबर  के  कहाँ  टूट  जाएँ ,
मोहब्बत  के  दरिया  में  तिनके  वफ़ा  के ,
किसे  है  खबर  के  कहाँ  डूब  जाएँ ,
अजब  दिल  की  बस्ती ,
अजब  दिल  की  हालत ,
हर एक  मोड़  मोसम  नयी  चाहतों  का ,
लगाये  हैं  हम  ने  भी  सपनों  के  पोधे ,
मगर  क्या  भरोसा  यहाँ  बारिशों  का ?
जिन्हें  दिल  से  सोचा ,
जिन्हें  दिल  से  चाहा ,
किसे  है  खबर  के  कहाँ  रूठ  जाएँ ..?
ये  शीशों  के  सपने ,
ये  धागों  के  रिश्ते!!



Zindagi Ye To Nahi Tujhko Sanwaraa Hi Na Ho
Kuch Na Kuch Tera Ahsaan Utara Hi Na Ho

- जां निसार अख्तर



अब जो रिश्तों में बंधा हूँ तो खुला ये राज़ मुझ पर 

कब परिंदे उड़ नहीं पाते हैं परों के होते

- Jaun Elia

Thursday, November 17, 2011


बजाहिर एक ही शब है फराके -यार मगर 
    
कोई गुजारने बैठे तो उम्र सारी लगी

-फराज


कुछ ख्वाहिशों को बेहद मुश्किल है जान पाना,

पत्थर से चोट खाने लहरों का लौट आना... 



दरीचे खोलकर अक्सर खुदी से बात होती है,
किया तो है, मगर कुछ और करना चाहता हूँ मैं 

लगी है होड़ शायद वक्त से आगे निकलने की,
मगर इस भीड़ से थोडा बिछड़ना चाहता हूँ मैं 


Tuesday, November 15, 2011


आग सीने में मोहब्बत की लगा देते हैं
"मीर" मिलते हैं मुझे जब भी रुला देते हैं

एक तुम हो कि गुनाह कह के टाल जाते हो
एक "ग़ालिब" हैं कि हर रोज़ पिला देते हैं

मैंने "राहत" से कहा फूँक दो दिल की दुनिया
वो मेरे ख़त को उठाते हैं जला देते हैं

जब भी "राना" से मोहब्बत का पता पूछता हूँ
हँस के माँ पर वो कोई शे'र सुना देते हैं ।

- सिराज फ़ैसल ख़ान

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे - गोपालदास 'नीरज'


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

 - गोपालदास 'नीरज'

Sunday, November 13, 2011


कोई फूलों से सीखे सर्फराज़े ज़िन्दगी होना
वहीँ से फिर महकते हैं जहां से ख़ाक होते हैं
 
-Shifa Gwaliori
 
 

Friday, November 11, 2011




नज़र से दूर रह कर भी किसी की सोच में रहना,

किसी के पास रहने का तरीका हो तो ऐसा हो.. ♥



Wednesday, November 2, 2011

हुई मुद्दत के "ग़ालिब" मर गया पर याद आता है.
वो हर एक बात पे कहना के यूँ होता तो क्या.

दायरा–कैफ़ी आज़मी



     

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे   
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को
इन्हीं दीवारों से टकराता हूँ
रोज़ बसते हैं कई शहर नये
रोज़ धरती में समा जाते हैं
ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी
वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं 
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धूप न साया न सराब
कितने अरमाँ है किस सहरा में
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब
नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है
दिल को मामूल है घबराना भी
रात अँधेरे ने अँधेरे से कहा
इक आदत है जिये जाना भी 
क़ौस एक रंग की होती है तुलू'अ
एक ही चाल भी पैमाने की
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद
मुश्किल क्या हो गई मयख़ाने की
कोई कहता था समंदर हूँ मैं
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं
ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ
अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं 
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ
कभी क़ुरान कभी गीता की तरह
चंद रेखाओं में सीमाओं में
ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह
राम कब लौटेंगे मालूम नहीं
काश रावन ही कोई आ जाता 
    
- कैफ़ी आज़मी