Tuesday, December 20, 2011


खावाहिशों का काफ़िला भी अजीब है..
गुज़रता वहीँ से है जहाँ रास्ते नहीं होते!!

Thursday, December 8, 2011

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता,

जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता,

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,

जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता,

सब कुछ तो है क्या ढूंढ़ती रहती हैं निगाहें,

क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता,

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,

जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यों नहीं जाता,

वो नाम जो बरसों से समाया है ज़ेहन में,

वो खवाब अगर है तो बिखर क्यों नहीं जाता!!


Tuesday, December 6, 2011

ये नहीं के मेरा.. दौर गुज़र गया,
बस ये है के एक नए दौर से रहा हूँ गुज़र!!


तुमको दे दी है इशारों में इजाज़त मैंने,
मांगने से ना मिलूँ तो चुरा लो मुझको 



Monday, November 28, 2011


बहुत मुद्दत से ऐसा है,
के तुम ख़ामोश रहते हो,
कोई गहरा है ग़म शायद,
जिसे चुप चाप सहते हो,
यूँही चलते हुए तन्हा,
कोई ग़मगीन से नगमें,
तुम अक्सर गुनगुनाते हो,
दोरान-ऐ-गुफ्तगू यूँही,
मिलें नज़रों से जब नज़रें,
तो बातें भूल जाते हो,
किसी गुम सुम सी हालत में,
या फिर बारिश के मौसम में,
फ़क़त इतना ही कहते हो,
उदासी बेवजा सी है,
बहुत बोझल तबियत है.
...
भला सच क्यूँ नहीं कहते,
मुझे तुम याद करते हो…!


Saturday, November 19, 2011



न करते शोर शराबा तो और क्या करते,
तुम्हारे शहर में कुछ और काम काज भी हो

रहेगी कब तलक वादों में कैद खुशहाली,
हर एक बार ही कल क्यूं?? कभी तो आज भी हो

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
अगर न हो कही ऐसा तो एहतजाज भी हो


- निदा फाजली

Friday, November 18, 2011


ये  शीशों  के  सपने ,
ये  धागों  के  रिश्ते ,
किसे  है  खबर  के  कहाँ  टूट  जाएँ ,
मोहब्बत  के  दरिया  में  तिनके  वफ़ा  के ,
किसे  है  खबर  के  कहाँ  डूब  जाएँ ,
अजब  दिल  की  बस्ती ,
अजब  दिल  की  हालत ,
हर एक  मोड़  मोसम  नयी  चाहतों  का ,
लगाये  हैं  हम  ने  भी  सपनों  के  पोधे ,
मगर  क्या  भरोसा  यहाँ  बारिशों  का ?
जिन्हें  दिल  से  सोचा ,
जिन्हें  दिल  से  चाहा ,
किसे  है  खबर  के  कहाँ  रूठ  जाएँ ..?
ये  शीशों  के  सपने ,
ये  धागों  के  रिश्ते!!



Zindagi Ye To Nahi Tujhko Sanwaraa Hi Na Ho
Kuch Na Kuch Tera Ahsaan Utara Hi Na Ho

- जां निसार अख्तर



अब जो रिश्तों में बंधा हूँ तो खुला ये राज़ मुझ पर 

कब परिंदे उड़ नहीं पाते हैं परों के होते

- Jaun Elia

Thursday, November 17, 2011


बजाहिर एक ही शब है फराके -यार मगर 
    
कोई गुजारने बैठे तो उम्र सारी लगी

-फराज


कुछ ख्वाहिशों को बेहद मुश्किल है जान पाना,

पत्थर से चोट खाने लहरों का लौट आना... 



दरीचे खोलकर अक्सर खुदी से बात होती है,
किया तो है, मगर कुछ और करना चाहता हूँ मैं 

लगी है होड़ शायद वक्त से आगे निकलने की,
मगर इस भीड़ से थोडा बिछड़ना चाहता हूँ मैं 


Tuesday, November 15, 2011


आग सीने में मोहब्बत की लगा देते हैं
"मीर" मिलते हैं मुझे जब भी रुला देते हैं

एक तुम हो कि गुनाह कह के टाल जाते हो
एक "ग़ालिब" हैं कि हर रोज़ पिला देते हैं

मैंने "राहत" से कहा फूँक दो दिल की दुनिया
वो मेरे ख़त को उठाते हैं जला देते हैं

जब भी "राना" से मोहब्बत का पता पूछता हूँ
हँस के माँ पर वो कोई शे'र सुना देते हैं ।

- सिराज फ़ैसल ख़ान

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे - गोपालदास 'नीरज'


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

 - गोपालदास 'नीरज'

Sunday, November 13, 2011


कोई फूलों से सीखे सर्फराज़े ज़िन्दगी होना
वहीँ से फिर महकते हैं जहां से ख़ाक होते हैं
 
-Shifa Gwaliori
 
 

Friday, November 11, 2011




नज़र से दूर रह कर भी किसी की सोच में रहना,

किसी के पास रहने का तरीका हो तो ऐसा हो.. ♥



Wednesday, November 2, 2011

हुई मुद्दत के "ग़ालिब" मर गया पर याद आता है.
वो हर एक बात पे कहना के यूँ होता तो क्या.

दायरा–कैफ़ी आज़मी



     

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे   
फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को
इन्हीं दीवारों से टकराता हूँ
रोज़ बसते हैं कई शहर नये
रोज़ धरती में समा जाते हैं
ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी
वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं 
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धूप न साया न सराब
कितने अरमाँ है किस सहरा में
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब
नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है
दिल को मामूल है घबराना भी
रात अँधेरे ने अँधेरे से कहा
इक आदत है जिये जाना भी 
क़ौस एक रंग की होती है तुलू'अ
एक ही चाल भी पैमाने की
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद
मुश्किल क्या हो गई मयख़ाने की
कोई कहता था समंदर हूँ मैं
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं
ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ
अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं 
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ
कभी क़ुरान कभी गीता की तरह
चंद रेखाओं में सीमाओं में
ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह
राम कब लौटेंगे मालूम नहीं
काश रावन ही कोई आ जाता 
    
- कैफ़ी आज़मी


Friday, October 14, 2011

Meri Her Nazar Teri Muntazir


Meri Her Nazar Teri Muntazir
Teri Her Nazar Kisi Aur Ki

Meri Zindagi Teri Bandagi

Teri Zindagi Kisi Aur Ki

Kabhi Waqt Jo Mile Tujhe

Zara AA K Dekh Mere Haal Ko,

Meri Her Ghari Tere Liye

Teri Her Ghari Kisi Aur Ki

Mujhe Sirf Teri Talab Thi

Par Jane Kion Tu Na Mila!!

"TU" Usay Mila Mere Sanam

Jisay Thee Talab Kisi Aur Ki.....
 

Wohi karwa’an, wohi raaste, wohi zindagi, wohi marhale …...
Magar apne apne maqam par kabhi tum nahi kabhi hum nahi...
  

गुज़र जाएगी ज़िन्दगी उसके बगैर भी 'फ़राज़'
वो हसरत-ए-ज़िन्दगी है शर्त-ए-ज़िन्दगी तो नहीं

-फ़राज़
 

Seekh Maujo'n se
"Ulajh" kr Jeeney ka Shaoor...

Sirf Sahil se Lipat jana
"Zindagi" Nahi Hoti...
 
 

Milay uljhanoo se fursat to zara dil se poch lena..,
Kia fursatoo mai hi yad karna MUHABBAT hai..
 
 

Monday, October 3, 2011


Bisaat-e-Dil Pe Ajab Hy Shikasta-e-Zaat Ka Lutf
Jahan Pe Jeet Attal Ho Wo Chaal Haar K Dekh

Friday, September 30, 2011


उन्हेँ नफ़रत है सारे जहाँ से

कोई नई दुनिया लाये कहाँ से

Ki gareebon ki galeeyon ke bhi kya kahne..

Wahan bachche milte hain lekin bachpan nai milta!!




Saturday, September 17, 2011



Dil kisi haal pe maane hi nahi jaan-e-'Faraz'
Mil gaye tum bhi to kya aur na jaane maange.


Yaadon ki ek haat si lagi hai shaam se

Yaadon ki ek haat si lagi hai shaam se
Bikte hain jahan mere ghum geeto ke naam se

Main usko dhoondh to loon magar kuch pata chale
Aawaz usne di hai mujhe kis mukaam se

Kewal khushi ko badh ke lagaya nahi gale
Main ghum se bhi mila hoon bade ahetraam se

Zindagi ke mod pe pahuncha ki tu mila
Ghar se chala tha waise kisi aur kaam se

Rahta hoon shaant har ghadi ghum ke nashe mein choor
Mujhko kahan hai wastaa meena-o-jaam se


Lehza nahi badla jaata

Hum ke shayar hain siyasat nahi aati humko
Humse munh dekh ke lehza nahi badla jaata.

Aisa lagta hai ke wo bhool gaya hai humko,
Ab kabhi khidki ka parda nahi badla jaata.

Jab rulaaya hai to hasne pe na majboor karo,
Roz beemaar ka nuskha nahi badla jaata.

Umar ek talkh hakikat hai dosto phir bhi
Jitne tum Badle ho Utna nahi badla jaata.

- Munawwar Rana


Balaa se jaaye agar karobaar jata hai

Kadam badhane mein khatra hai maut ka lekin,
Mein laut'ta hoon to sara waqar jata hai.

Mein apna lehza to tabdeel kar nahi sakta,
Balaa se jaaye agar karobaar jata hai.

- Munawwar Rana

*waqar = image

Bola hindustaan hai

Ek gudiya ki kai kathputliyon mein jaan hai
Aaj shayar ye tamasha dekh kar hairaan hai

Khaas sadaken band hain kab se marammat ke liye
Ye humare waqt ki sabse badi pahchaan hai

Ek budha aadami hai mulk mein ya youn kaho
Is andheri kothari mein ek roshandaan hai

Maslahat aameez hote hain siyaasat ke kadam
Tu na samajhega siyaasat tu abhi insaan hai

Is kadar pabandi-e-mazahab ki sadaken aapki
Jab se aazadi mili mulk mein ramzaan hai

Kal numaaish mein mila wo cheethadhe pahne hue
Maine poocha naam to bola hindustaan hai

Mujh mein rahte hain karodon log chup kaise rahoon
Har ghazal ab saltanat ke naam ek bayaan hai

- Dushyant Kumar

Ye chaandni bhi jin ko choote huye darti hai

Ye chaandni bhi jin ko choote huye darti hai
Duniya unhi phoolon ko pairon se masalti hai

Shohrat ki bulandi bhi pal bhar ka tamaasha hai
Jis daal pe baithe ho woh toot bhi sakti hai

Labon mein chingaari jaise koi rakh jaaye
Youn yaad teri shab bhar seene mein sulagti hai

Aa jata hai khud khinch kar dil seene se patri par
Jab raat ki sarhad se ek rail guzarti hai

Aansoon kabhi palkon par der tak nahi rukte
Udd jate hain ye panchi jab shaakh lachakti hai

Khush rang parindon ke laut aane ke din aaye
Bichde huye milte hain jab barf pighalti hai

- Bashir Badr


Friday, September 16, 2011

Koi jata hai yahan se na koi aata hai

Koi jata hai yahan se na koi aata hai
Ye diya apne andhere mein ghuta jata hai

Sab samajhte hain wahi raat ki kismat hoga
Jo sitaara ke bulandi pe nazar aata hai

Main isi khoj mein barhta hi chala jata hoon
Kis ka aanchal hai ke jo lehraata hai

Meri aankhon mein hai ek abr ka tukra shayad
Koi mausam ho sar-e-shaam baras jata hai

De tasalli koi to aankh chalak uthti hai
Koi samjhaaye to dil aur bhi bhar aata hai

- Bashir Badr

Maanga khuda se raat din tere siva kuch bhi nahi

Socha nahi accha bura, dekha suna kuch bhi nahi
Maanga khuda se raat din tere siva kuch bhi nahi

Dekha tujhe, socha tujhe, chaha tujhe, pooja tujhe
Meri wafa, meri khata, teri khata kuch bhi nahi

Jis par hamari aankh ne, moti bichaaye raat bhar
Bheja wahi kaagaz tujhe, humne likha kuch bhi nahi

Ek shaam ki dehaleez par, baithe rahen wo der tak
Aankhon se ki baanten bahut, munh se kaha kuch bhi nahi


Thursday, September 15, 2011

जो बीत गयी सो बात गयी

जो बीत गई सो बात गई
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गयी सो बात गयी 

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियां
मुर्झाईं कितनी वल्लरिया
जो मुर्झाईं फिर कहां खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गयी सो बात गयी 

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिटटी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गयी सो बात गयी 

मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आये हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर 
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गयी सो बात गयी ।। 

- डॉ. हरिवंशराय 'बच्चन'


रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे। 

- रामधारी सिँह 'दिनकर'

कारवाँ गुज़र गया


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,
और हम झुकेझुके,
मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,
और हम लुटेलुटे,
वक्त से पिटेपिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजानसे,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

- गोपालदास नीरज

रात आधी खींच कर मेरी हथेली

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में।
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में।
मैं लगा दूँ आग इस संसार में
है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर।
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ उजाले में अंधेरा डूब जाता।
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता।
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा।
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने
पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम।
फिर न आया वक्त वैसा
फिर न मौका उस तरह का
फिर न लौटा चाँद निर्मम।
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ।
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली

- बच्चन

इस नदी की धार में

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

- दुष्यन्त कुमार

एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़ कर मैं यों बढ़ी
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में
चू पड़ूँगी या कमल के फूल में
बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वो समन्दर ओर आयी अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी मोती बनी

लोग यौं ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर !

-अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध`

अँधेरे का दीपक


है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था ,
भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम उशा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनो हथेली,
एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बातसे मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता पर समय की मुसकुराना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिसमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,
एक अंतर से ध्वनित हो दूसरे में जो निरन्तर,
भर दिया अंबरअवनि को मत्तता के गीत गागा,
अन्त उनका हो गया तो मन बहलने के लिये ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय वे साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आए,
पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,
वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका,
किन्तु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है?
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

- बच्चन

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी

गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या

रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती

वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है 

-गोपालदास "नीरज"

और भी दूँ

मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

माँ, तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अंकिचन
किंतु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण
गान अर्पित, प्राण अर्पित
रक्त का कण-कण समर्पित 
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

कर रहा आराधना मैं आज तेरी
एक विनती तो करो स्वीकार मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया घनेरी
स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण-क्षण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

तोड़ता हूँ मोह का बंधन क्षमा दो
गाँव मेरे, द्वार, घर, आँगन क्षमा दो
देश का जयगान अधरों पर सजा है
देश का ध्वज हाथ में केवल थमा दो
ये सुमन लो, यह चमन लो
नीड़ का तृण-तृण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ !

-रामावतार त्यागी

शक्ति और क्षमा

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

-रामधारी सिंह 'दिनकर'

पथ की पहचान

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

पुस्तकों में है नहीं
छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की जबानी

अनगिनत राही गए
इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी

यह निशानी मूक होकर
भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा
व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना

तू इसे अच्छा समझ
यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना

हर सफल पंथी यही
विश्वास ले इस पर बढ़ा है
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे

किस जगह यात्रा खतम हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे

कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

- बच्चन

बसंती हवा

हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

सुनो बात मेरी -
अनोखी हवा हूँ।
बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्त्मौला।
नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ।

न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

जहाँ से चली मैं
जहाँ को गई मैं -
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं।
झुमाती चली मैं!
हवा हूँ, हवा मै
बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी।

पहर दो पहर क्या,
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
खड़ी देख अलसी
लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी -
हिलाया-झुलाया
गिरी पर न कलसी!
इसी हार को पा,
हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों,
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा -
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!

- केदारनाथ अग्रवाल