Wednesday, September 14, 2011

मुक्तक / दुष्यंत कुमार

तरस रहा है मन फूलों की नयी गन्ध पाने को
खिली धूप में, खुली हवा में, गाने-मुसकाने को
तुम अपने जिस तिमिरपाश में मुझको क़ैद किए हो 
वह बन्धन ही उकसाता है बाहर आ जाने को

तिमिरपाश = अंधेरे का बंधन

- दुष्यंत कुमार

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