Monday, November 28, 2011


बहुत मुद्दत से ऐसा है,
के तुम ख़ामोश रहते हो,
कोई गहरा है ग़म शायद,
जिसे चुप चाप सहते हो,
यूँही चलते हुए तन्हा,
कोई ग़मगीन से नगमें,
तुम अक्सर गुनगुनाते हो,
दोरान-ऐ-गुफ्तगू यूँही,
मिलें नज़रों से जब नज़रें,
तो बातें भूल जाते हो,
किसी गुम सुम सी हालत में,
या फिर बारिश के मौसम में,
फ़क़त इतना ही कहते हो,
उदासी बेवजा सी है,
बहुत बोझल तबियत है.
...
भला सच क्यूँ नहीं कहते,
मुझे तुम याद करते हो…!


1 comment:

  1. भला सच क्यूँ नहीं कहते,
    मुझे तुम याद करते हो…!

    वाह वाह बहुत ही दिलक्स पंक्तियाँ लिखी हैं ......बधाइयां
    आपका मेरे ब्लॉग पर हार्दिक अभिन्दन हैं दीपिका जी
    please join my blog
    http://rohitasghorela.blogspot.com

    ReplyDelete