प्यास की शिद्दत के मारों की अज़ीयत देखिये
खुश्क आँखों में नदी के ख्वाब पत्थर हो गए
अज़ीयत: परेशानी
सबके सब सुलझा रहे हैं आसमां की गुत्थियाँ
मसअले सारे ज़मीं के हाशिये पर हो गए
हमने तो पास-ए -अदब में बंदा परवर कह दिया
और वो समझे कि सच में बंदापरवर हो गए
~मनीष शुक्ला
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