दास्ताँ दिलचस्प थी वो धूप, तितली, फूल की
वक्त बदले में मगर मेरी जवानी ले गया
मेरी बातें अनसुनी कीं, मेरा चेहरा पढ़ लिया
लफ्ज़ उसने फेंक डाले और मानी ले गया
रूप का दरिया था वो, सब बुत बने देखा किये
हमको पत्थर कर गया ज़ालिम रवानी ले गया
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सैयद फ़ज़लुल मतीन
सैयद फ़ज़लुल मतीन
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